अब कहां जाएंगे धोबी के कुत्ते…

सौरभ भारद्वाज

चाणक्य की किताब से निकलकर साम, दाम, दंड, भेद जैसी तमाम युद्ध युक्तियां गुजरात राज्यसभा चुनाव में उतर आई थीं। बीजेपी के चाणक्य अमित शाह और साथ ही स्मृति ईरानी का चुना जाना तय था, लेकिन भयंकर सट्टा इस बात पर लगा था कि कांग्रेस के चाणक्य अहमद पटेल अपनी कुर्सी बचा पाते हैं या नहीं। अपनी जीत को लेकर आश्वस्त अमितशाह नहीं चाहते थे कि उनके धुर विरोधी अहमद पटेल इस बार राज्य सभा में जाएं। लेकिन सियासत की इस चौसर पर उतने प्यादों का हृदय परिवर्तन नहीं हुआ जितने अहमद पटेल को राज्यसभा जाने से रोक पाते। यह बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की अगली कड़ी थी, लेकिन अहमद पटेल चुनाव जीत गए। हालांकि इस चुनाव ने एक नया सूत्र भारतीय लोकतंत्र के मैनेजरों के हाथ में दे दिया है।

पार्टी में फूट डालो और पार्टी तोड़ कर नई पार्टी बना दो। अगर उसके लायक संख्या बल नहीं है तो फिर माननीय सदस्य अपनी अंतरात्मा की आवाज पर अपनी विधानसभा सदस्यता से त्याग पत्र दे दें। इससे कुल मौजूदा सदस्यों की संख्या घटने पर जीत के लिए वांछित वोटों की संख्या भी घट-बढ़ सकती है। हरियाणा राज्यसभा चुनाव में तो एक कलम ही कलाकार हो गई थी। जिसकी आड़ में वोट डाला भी गया और माना भी न गया। कहते हैं कि एक-एक विधायक को दो-दो करोड़ मिले थे। चर्चा है कि गुजरात चुनाव में हृदय परिवर्तन का रेट दस करोड़ हो गया है।

भजनलालवाद

वैसे कभी हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल को इस हृदय परिवर्तन कला का माहिर समझा जाता था। दल-बदल और जोड़-तोड़ में देश भर में उनका कोई सानी नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने तो इस कला का नाम ही भजनलालवाद कर दिया था। बहुमत सिद्ध करने से पहले एमएलए या सांसदों को भारत भ्रमण के बहाने उड़ा ले जाना भी भजनलाल ने ही देश को सिखाया। नर्सिम्हाराव की सरकार बचने से पहले झारखंड के सांसद सूरजकुंड की पवित्र भूमि पर भजनलाल के आतिथ्य में ही राष्ट्र चिंतन करते रहे। खैर… अतीत छोड़ वर्तमान में देखें तो अपना दल छोडऩे के बाद या बागी होने के बाद ऐसे विधायकों का भविष्य क्या होगा यह बड़ा सवाल है।

क्या कांग्रेस के इन बागियों को बीजेपी विधानसभा में टिकट देगी। क्या ये अपनी राजनीतिक पारी जारी रख पाएंगे। क्या जनता ऐसे व्यक्ति को फिर एमएलए बना कर विधानसभा में भेजेगी। मुझे पता है कि पॉलिटिकल मैनेजरों को इन मोहरों के बचे रहने या पिट जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आयाराम या गयाराम उनके मिशन के बेहद मामूली प्यादे हैं। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि देश दिल्ली से नहीं गुजरात से चलता है।

Post Author: Veethika Bhardwaj

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