खट्टर जी ! आप रहने दो आप से न होगा

प्राइवेट स्कूलों में फीस बढ़ोतरी रोकने का आदेश चौबीस घंटे में वापस
सौरभ भारद्वाज।।
बारबार बारम्बार सरकार का मज़ाक उड़ रहा है। अपने फैसले आप 24 घंटे के भीतर ही बदल रहे हैं। इस चूक की वजह क्या है?
1. या तो फैसले हड़बड़ी में लिए जा रहे हैं। मतलब अफ़सर योग्य नहीं हैं।
2. या फैसले लेने के बाद सरकार पर इतना दबाब आ जाता है कि सरकार उसे झेल नहीं पाती और फैसला बदल देती है।
इन दिनों हरियाणा फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर उबाल रहा है। करनाल में 20 तारीख को प्राइवेट स्कूलों को फीस बढ़ने से रोका गया। इस फैसले की स्याही भी सूखी नहीं थी कि 21 तारीख़ यानि आज सरकार का नया फ़रमान जारी हो गया कि कल वाला आदेश रद्द कर दिया गया है।
अब आप बताएं कि सरकार कम बुद्धि वाली है या कमज़ोर दिल वाली।
वैसे आप के विधायक जब तक प्राइवेट स्कूलों से अपनी रैलियों के लिए थैली और बसें लेते रहेंगे तब तक आप की सरकार सख्त फैसले कर पायेगी इसमें संशय है।
सुझाव दे रहा हूँ अच्छे लगें तो इम्प्लीमेंट करना रिजल्ट्स आएंगे शर्तिया।
घोस्ट स्टूडेंट : इलाज गैस सिलेंडर
हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बहुत बड़ी तादाद में घोस्ट स्टूडेंट पढ़ते हैं। पढ़ते तो हैं ये प्राइवेट स्कूलों में लेकिन हाज़िरी लगती है सरकारी में। अगर न लगे तो मास्टर जी का तबादला दूसरे स्कूल में हो जाये। सबसे पहले सरकार स्कूलों में जितना खर्चा करती है उस का एक छात्र पर होने वाला खर्चा निकाले फिर वो पैसा छात्र से फीस के रूप में प्रतिमाह जमा करने के लिए कहा जाये। जब वो छात्र पैसा जमा करे तो सिलेंडर सबसिडी की तरह सरकार उसके खाते में वह राशि वापस डलवा दे। इससे स्कूलों में भूत छात्र अलोप हो जायेंगे।
ज्यादा छात्र तो स्कूल : कम छात्र तो बस
सरकारी स्कूलों में बच्चे घटेंगे तो मास्टर खाली होंगे। खाली होंगे तो अड़ोस-पड़ोस के दूसरे सरकारी स्कूल में जहाँ बच्चे ज्यादा हैं वहां उनका तबादला करे। कम से कम कितने बच्चे होंगे तो गांव में सरकारी स्कूल खुलेगा इसकी पालिसी बने। जब स्कूल खोलने या स्कूल का स्तर बढ़वाने की मांग आये तो सबसे पहले छात्रों की संख्या निर्धारित हो फिर एक महीने की फीस एडवांस में जमा करने को कहा जाये। इस से ग्रामीणों का इंट्रेस्ट भी पता चलेगा। छात्र कम हों तो बजाय स्कूल खोलने के सरकार उन गाँव से बस चलवाए दूसरे गांव या शहर के लिए। जहाँ जा कर वो बच्चे पढ़ सकें।
सर्व शिक्षा अभियान : चनौरी मत बांटो फरीदाबाद जैसे ज़िले में सरकार इस मद में 100 करोड़ रुपया खर्च करती है। बजाय हर स्कूल को कुछ-कुछ रुपया बाँटने के सरकार 10 स्कूल हर साल चुने और उन को आधुनिक बनाने के लिए हरेक पर 10 करोड़ रुपया खर्च करे। एक स्कूल औसतन 3000 बच्चों को बढ़िया प्राइवेट स्कूल जैसी एजुकेशन दे सकता है। और 10 स्कूल 30 हज़ार बच्चों को। अगले 3 साल में 1 लाख बच्चों के लिए आप बढ़िया इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था करवा सकते हैं।
लेकिन हरेक को तुरंत चनौरी बाँटने के चक्कर में आप की सरकार कुछ नहीं करेगी। इस लिए आप रहने ही दो आप से न हो पायेगा।

Post Author: SAURABH BHARDWAJ

मशहूर पत्रकार सौरभ भारद्वाज पिछले लगभग दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स जैसे मीडिया संस्थानों में प्रतिष्ठित पदों पर काम करने के बाद श्री भारद्वाज अब वीओएफ मीडिया के समूह संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता श्री भारद्वाज अनेक सामाजिक संगठनों के साथ भी जुड़े हैं।

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