छठे नवरात्रे पर वैष्णोदेवी मंदिर में हुई मां कात्यायनी की पूजा

मंदिर में सुबह से ही भक्तों का लगा तांता

फरीदाबाद। नवरात्रों के छठे दिन सिद्धपीठ मां वेष्णोदेवी मंदिर में मां कात्यायनी की भव्य पूजा की गई। इस अवसर पर मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। मंदिर में बसपा प्रत्याशी मनधीर मान मां कात्यायानी के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचे। उन्होंने पूजा अर्चना में हिस्सा लिया। इस अवसर पर मंदिर संस्थान के प्रधान जगदीश भाटिया ने उनका स्वागत किया। इस मौके पर भाजपा नेता राधेश्याम, प्रताप भाटिया, मनु आनंद, प्रदीप झांब, राजीव शर्मा, आनंद मल्होत्रा, गोविंद, गिर्राजदत गौड, फकीरचंद कथूरिया, अनिल ग्रोवर, प्रीतम धमीजा एवं रजशीन वर्मा मुख्य रूप से उपस्थित थे।

मंदिर संस्थान के प्रधान जगदीश भाटिया ने बताया कि भगवती दुर्गा के छठे रूप का नाम कात्यायनी है। ये महर्षि कात्यायन के घर पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थी। मान्यता है कि कात्यायनी की भक्ति और उपासना से बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। जगदीश भाटिया के अनुसार यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में मां कात्यायनी का उल्लेख सबसे पहले हुआ है। स्कंद पुराण में बताया गया है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दिये गए सिंह पर सवार होकर महिषासुर का वध किया था। वे शक्ति की आदि रूपा मानी जाती हैं, जिनका उल्लेख पाणिनि, पतांजलि के महाभाष्य में भी किया गया है।, ये ग्रंथ दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखा गया था।

मां कात्यायनी का वर्णन देवी भागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में भी किया गया है । कहते हैं कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।

जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया। तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। उस के बाद ये महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।
इस अवसर पर जगदीश भाटिया ने बताया कि मां कात्यायनी की सच्चे मन से पूजा करने पर मांगी गई हर मुराद अवश्य पूरी होती है

Post Author: abha soni

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